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| قصيده
زير نيز معمايي از منوچهري دامغاني
است: |
-161
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| جسم
ما زنده به جان و، جانِ تو زنده به تن |
اي
نهاده بر ميان فرق، جان خويشتن |
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| گويي
اندر روح تو، مضمر همي گردد بدن |
هر
زمان روح تو، لختي از بدن كمتر كند |
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| ور
نيي عاشق، چرا گريي همي بر خويشتن |
گر
نيي كوكب، چرا پيدا نگردي جزبه شب |
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| عاشقي
آري، وليكن هست معشوقت لگن |
كوكبي
آري، وليكن آسمانِ تست موم |
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| پيرهن
بر تن، تو تن پوشي هم بر پيرهن |
پيرهن
در زير تن پوشي و، پوشد هر كسي |
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| چون
شوي بيمار، بهتر گردي از گردن زدن |
چون
بميري، آتش اند تو رسد، زنده شوي |
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| بگريي بي ديدگان و، بازخندي بي
دهن |
بشكفي بي نوبهار و، پژمري به
مهرگان |
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| دشمن خويشيم هر دو، دوستدار
انجمن |
تو مرا ماني و من هم مرترا مانم
همي |
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| دوستان
در راحتند از ما و، ما اندر حزن |
خويشتن
سوزيم هر دو، بر مراد دوستان |
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| هر
دو سوزانيم، و، هر دو فرد و هر دو
ممتحن |
هر
دو گريانيم؟ هر دو زرد، هر دو در گداز |
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| وانچه
تو بر سر نهادي، در دلم داردوطن |
آنچه
من در دل نهادم، بر سرت بينم همي |
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| اشك
من چون ريخته بر زر همي برگ سمن |
اشك
تو چون دُر كه بگذاري و، برريزي به زر |
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| غمگسار
من تويي، من زانِ تو، تو زانِ من |
رازدار
من تويي، همواره يار من تويي |
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| وان
من چون شنبليد پژمريده در چمن |
رويِ
تو چون شنبليد نو شكفته بامداد |
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| بي
وسن باشم همه شب، روز باشم با وسن |
رسم
ناخفتن به روز است و من از بهر ترا |
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| وز
وصالت بر شب تاري شدستم مفتتن |
از
فراق روي تو گشتم، عدوي آفتاب |
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| ني
يكيشان رازدار وني وفا اندر دو تن |
من
دگر ياران خود را آزمودم خاص و عام |
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| هر
شبي تا روز ديوان ابوالقاسم حسن |
تو
همي تابي و من بر تو همي خوانم به مهر |
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جواب چيستان |
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| معماي
زير از سروده هاي جمال الدين اصفهاني
است: |
-162 |
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| چون
روح با لطافت و چون عقل باصفا |
آن
جرم پاك چيست چو ارواح انبيا |
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| هم
دايه شجرها، هم پايه گيا |
من
مغز آفرينش و هم مايه حيات |
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| از
رنگ چون زمرد و، در شكل اژدها |
از
قدر، همچو جان و، به قوت، چو آسمان |
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| سازنده
تر زدولت و، روشن تر از ذكا |
خوشخوارتر
زنعمت و، شيرين تر از اميد |
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| مردافكني
ضعيف و، سبك قيمتي روا |
گردنكشي
مطيع و، خروشنده بي خموش |
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| فارغ
زرنگ و بوي چو پيران پارسا |
خالي
زنقش و رسم چو صوفي كبودپوش |
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| مطلوب
آرزوي شهيدان كربلا |
مقصود
جستجوي سكندر به شرق و غرب |
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| گاهي
كند زدست خسي پيرهن قبا |
گاه
از ميان كوه گشايد همي كمر |
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| زآسيب
دور چرخ ولي چرخ آسيا |
دايم
چو چشم مردم آزاده اشكبار |
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| و
او سر به شيب، چون عدوي صدر مقتدا |
زو
سرفراز گشته همه چيز در جهان |
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جواب چيستان |
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| به
دامن چو برخاست بر بط بسود |
چو
نامش بپرسيدم، از ناز، زود |
-163 |
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| كه
نامش زبربط بسودن چه بود |
به
تازي دانستم آن رمزِ او |
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جواب چيستان |
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| بنگار
و بپسوند به سوفار يكي تير |
تيري
و كماني و يكي نقش نشانه |
-164 |
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| آن
بت كه به خويشتن قرين نيست به كشمير |
نامِ
بتِ من بازشناسي به تمامي |
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جواب چيستان |
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| رو
تو قلبِ قلب را برقلبِ قلبِ قلب زن |
گر
بخواهي نام آن زيبا رُخِ سيمين بدن |
-165 |
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جواب چيستان |
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| گاه
زنده شود، گهي بمُرَد |
چيستند
آن دو خواهران كه يكي |
-166 |
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| خود
از آن خواهر دگر بخورد |
آن
خورنده است سخت حشك وليك |
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| اين
بر آن كش خورد به گاهِ نبرد |
آن
مراين را خورد، وليكن باز |
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| سويِ
ايشان نگر، به چشم خرد |
هر
دو خواهر، به زير پاي تواند |
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جواب چيستان |
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| معماي
زير از ناصر خسرو قبادياني است: |
-167 |
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| كه
بيايند، از آسمان برآن |
چيست
آن، لشكر فرشتگان |
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| چون
بشويندش، آن فريشتگان |
سوي
آن مرده اي، كه زنده شود |
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| به
بهار و به تير و تابستان؟ |
چيست
آن، مرده فريشته خوار |
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جواب چيستان |
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| به
جان چار و به تن پنج و به پا ه |
عجايب
صنعتي ديدم در اين دشت |
-168 |
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جواب چيستان |
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| گاه
باشد سربريده، گاه كاكُل بر سر است |
شاهي
كه در كشور، ميان لشكر است |
-169 |
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| گاه
دختر سربرهنه، گاه چادر بر سر است |
گاه
بر فرقش نهاده دختري زيباسرشت |
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جواب چيستان |
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| سرش
در آب و دنبالش در آتش |
عجايب
صنعتي ديدم در اين دَش |
-170 |
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| كه
بيرون آورد ماه منقّش |
به
يك دم مي خورد صد آدمي را |
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جواب چيستان |
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| مي
خواست كند كاكُل مشكين شانه |
دي
رفت به حمّام
بتي از خانه |
-171 |
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| در
حمام است، شانه، گفتا نه |
از
روي صفا گفت چو با
حمّامي |
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جواب چيستان |
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| كه
زند خيمه، هر سحرگاهي |
چيست
آن طرفه، ماه خرگاهي |
-172 |
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| و
بمانند موش و دو ماهي |
پنج
پر زير چتر خود دارد |
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| نيمه
اش موش و نيمه اش ماهي |
آن
يكي ديگر ديگرش كه مي خواهد |
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جواب چيستان |
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| گاه
بيني چو لاله احمر |
چيست
آن طرفه قلعه بي در |
-173 |
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| كز
گريبان او برآرد سر |
گاه
بيني زمردين عَلَمي |
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جواب چيستان |
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| به
تازي و دري و ضد تصحيف |
زلعل
يار خواهم ضد شرقي |
-174 |
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جواب چيستان |
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| سلامت
وقف شد از گوشه گيران |
به
پرهيز اي دل از ابناي دوران |
-175 |
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جواب چيستان |
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بعدي
12
11
10
9
8
7
6
5
4
3
2
1
قبلي |
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