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صاف
و درد |
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كه ز ايام، دلت
زود آزرد
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غنچه
اي گفت به پژمرده گلي
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ز چه رو، كاستي و
گشتي خرد |
آب، افزون و بزرگ
است فضا |
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نه فتاد و نه شكست
و نه فسرد |
زين همه سبزه و
گل، جز تو كسي |
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نه چنان است كه
داند سترد |
گفت، زنگي كه در
آيينه ماست |
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صاف خورديم و رسيديم
به درد |
دي، مي هستي ما صافي
بود |
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بگرفتش ز من و بر تو
سپرد |
خيره نگرفت جهان، رونق
من |
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باغبان فلكم سخت فشرد |
تا كند جاي براي تو
فراخ |
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چه توان كرد، چو
مي بايد مرد |
چه توان گفت به يغماگر
دهر |
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آن كه آورد تورا،
ما را برد |
تو بباغ آمدي و
ما رفتيم |
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آنچه را ما
نشمرديم، شمرد |
اندرين دفتر
پيروزه، سپهر |
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چه خبر داشت كه
خواهد پژمرد |
غنچه، تا آب و
هوا ديد شكفت |
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همه كس باده ازين
ساغر خورد |
ساقي ميكده
دهر، قضاست |
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