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پيام
گل |
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كه رازي كه گويم
به بلبل بگويي
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به آب
روان گفت گل كاز تو خواهم
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بخاك ار در افتد،
غبارش بشويي |
پيام ار فرستد،
پيامش بياري |
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كه فردا بيايي و
ما را ببويي |
بگويي كه ما را
بود ديده بر ره |
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نيايي مرا، گر چه
عمري بجويي |
بگفتا به جوي آب
رفته نيايد |
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باميد من هرگز اين ره
نپويي |
پيامي كه داري به پيك
دگر ده |
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چو پژمرده گشتي تو،
ديگر نرويي |
من از جوي چون بگذرم بر
نگردم |
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بخوان آن كسي را كه
مشتاق اويي |
بفردا چه مي افكني كار
امروز |
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زبلبل خوشي و ز گل
خوبرويي |
بد انديشه گيتي به ناگه
بدزدد |
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كه بي رنگ و بي
بوي، چون خاك كويي |
چو فردا شود،
ديگرت كس نبويد |
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تو اندر دل باغ،
چون آرزويي |
دل از آرزو يك
نفس بود خرم |
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تو مانند آبي كه
اكنون به جويي |
چو آب روان خوش
كن اين مرز و بگذر |
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نماند است در روي
نيكو، نكويي |
نكو كار شو تا
تواني. كه دايم |
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چو گردون گردان
كند تند خويي |
تو پاكيزه خو را
شكيبي نباشد |
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| زياران
يكدل، كسي جز دورويي |
نبيند گه سختي و
تنگدستي |
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