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پروين
اعتصامي <
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اشعار شاعران <
فرهنگ وادب |
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اي مرغك |
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پرواز كن و
پريدن آموز
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اي
مرغك خرد، زاشيانه
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در باغ و چمن
چميدن آموز |
تا كي حركات
كودكانه |
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رام از چه شدي،
رميدن آموز |
رام تو نمي شود
زمانه |
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بر مردم چشم،ديدن
آموز |
منديش كه دام هست
يا نه |
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هنگام شب، آرميدن آموز |
شو روز بفكر آب و دانه |
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داني كه چسان شدست
آباد |
اين لانه ايمني كه
داري |
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تا گشت چنين بلند
بنياد |
كردند هزار استواري |
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دوريش ز دستبرد
صياد |
دادند
باوستادكاري |
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وز عهد گذشتگان
كني ياد |
تا عمر تو با
خوشي گذاري |
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آسايش كودكان
نوزاد |
يك روز، تو هم
پديد آري |
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آرامگه دو
مرغ خرسند |
اين خانه پاك،
پيش از اين بود |
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| يك
دل شده از دو عهد و پيوند |
كرده به گل
آشيانه اندود |
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هم رنجبر و هم
آرزومند |
يك رنگ چه در
زيان چه در سود |
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آورده پديد بيضه
اي چند |
از گردش روزگار
خشنود |
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وين مادر بس
نهفته فرزند |
آن كي، پدر هزار
مقصود |
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بنشيت براي
پاسباني |
گاهي نگران ببام
و روزن |
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در فكرت قوت
زندگاني |
روزي بپريد
سوي گلشن |
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آورد براي
سايباني |
خاشاك بسي ز
كوي و برزن |
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آموخت حديث
مهرباني |
يك چند به
لانه كرد مسكن |
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آن قدر نمود
جانفشاني |
آن قدر پرش
بريخت از تن |
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در دامن
مهر پروراندت |
آن بيضه بهم
شكست و مادر |
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زير پر
خويشتين نشاندت |
چون ديد ترا
ضعيف و بي پر |
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تا دانه و
ميوه اي رساندت |
بس رفت بكوه و
دشت و كهسر |
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بر بامك
آشيانه خواندت |
چون گشت هواي
دهر خوشتر |
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از شاخه
بشاخه اي پراندت |
بسيار پريد
تا كه آخر |
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از زحمت
حبس و فتنه دام |
داد آگهيت
چنانكه داني |
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بي گاه مپر
ببرزن و بام |
آموخت همي كه
تا تواني |
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سرمست براغ و
باغ مخرام |
هنگام بهار
زندگاني |
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روز عمل و
زمان آرام |
كوشيد بسي كه
در نماني |
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چون تجربه
يافتي سرانجام |
برد اين همه
رنج رايگاني |
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رفت
و بتو واگذاشت اين كار |
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