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احوال
ليلي |
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سر
دفتر آيت نكويي
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شاهنشه
ملك خوبرويي
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فهرست
جمال هفت پرگار
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از
هفت خليفه جامگي خوار
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رشك
رخِ ماه آسماني
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رنجِ
دل سرو بوستاني
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محراب
نماز بُت پرستان
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قنديلِ
سراي و سرو بستان
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همخوابه
عشق و همسرناز
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هم
خازن و هم خزينه پرداز
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پيرايه
گر پرند پوشان
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سرمايه
ده شكر فروشان
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دلبند
هزار دُرّ مكنون
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زنجير
بر هزار مجنون
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ليلي
كه به خوبي آيتي بود
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وانگشت
كش ولايتي بود
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سيراب
گلش پياله در دست
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از
غنچه نوبري برون جست
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سرو
سهي اش كشيده تر شد
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ميگون
رطبش رسيده تر شد
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مي
رست به باغ دلفروزي
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مي
كرد به غمزه خلق سوزي
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از
جادويي كه در نظر داشت
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صد
ملك به نيم غمزه برداشت
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مي
كرد به وقت غمزه سازي
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بر
تازي و تُرك تركتازي
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صيدي
زكمند او نمي رست
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غمزش
بگرفت و زلف مي بست
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از
آهوي چشم نافه وارش
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هم
نافه هم آهوان شكارش
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وز
حلقه زلف وقت نخجير
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بر
گردن شير بست زنجير
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ازچهره
گل از لب، انگبين كرد
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كان
ديد طبرزد آفرين كرد
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دلداده
هزار نازنينش
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در
آرزوي گل انگبينش
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زلفش
ره بوسه خواه مي رفت
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من
گانش خدا دهاد مي گفت
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برده
به دو رخ ز ماه پيشي
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گل
را دو پياده داده بيشي
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قدش
چو كشيده زاد سروي
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رويش
چو به سرو بر، تذروي
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لبهاش
كه خنده بر شكر زد
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انگشت
كشيده بر طبر زد
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لعلش
كه حديث بوس مي كرد
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بر
تنگ شكر فسوس ميكرد
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چاه
زنخش كه سرگشاده
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صد
دل به غلط در اوفتاده
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زلفش
رسني فكنده در راه
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تا
هر كه فتد برآرد از چاه
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بااين
همه ناز و دلستاني
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خون
شد جگرش ز مهرباني
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در
پرده كه راه بود بسته
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مي
بود چو پرده بر شكسته
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مي
رفت نهفته بر سر بام
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نظّاره
كنان زصبح تا شام
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تا
مجنون را چگونه بيند
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با
او نفسي كجا نشيند
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او
را به كدام ديده جويد
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بااو
غم دل چگونه گويد
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از
بيم رقيب و ترس بدخواه
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پوشيده
به نيمشب زدي آه
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چون
شمع به زهر خنده مي زيست
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شيرين
خنديد و تلخ بگريست
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گل
را به سرشك مي خراشيد
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وز
چوب رفيق مي تراشيد
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مي
سوخت به آتش جدايي
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نه
دود در او نه روشنايي
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جز
سايه نبود پرده دارش
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جز
پرده كسي نه غمگسارش
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از
بس كه به سايه راز مي گفت
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همسايه
او به شب نمي خفت
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مي
خورد غمي به زير پرده
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غم
خورده ورا و غم نخورده
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در
گوش نهاده حلقه زر
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چون
حلقه نهاده گوش بر در
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با
حلقه به گوش كس نينداخت
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در
جستن نور چشمه ماه
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چون
چشمه بمانده چشم بر راه
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تا
خود كه بدو پيامي آرد
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زآرام
دلش سلامي آرد
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بادي
كه ز نجد بر دميدي
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جز
بوي وفا در او نديدي
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هر
جا كه ز كنج خانه مي ديد
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بر
خود غزلي روانه مي ديد
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هر
طفل كه آمدي ز بازار
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بيتي
گفتي نشانده بر كار
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هر
كس كه گذشت زير بامش
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مي
داد به بيتكي پيامش
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ليلي
كه چنان ملاحتي داشت
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در
نظم سخن فصاحتي داشت
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ناسفته
دُري و دُرهمي سفت
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چون
خود همه بيت بكر مي گفت
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بيتي
كه ز حسب حال مجنون
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خواندي
به مَثَل چو دُرّ مكنون
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آن
را دگري جواب گفتي
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آتش
بشنيدي آب گفتي
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پنهان
ورقي به خون سرشتي
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و
آن بيتك را بر او نوشتي
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بر
راهگذر فكندي از بام
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دادي
زسمن به سرو پيغام
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آن
رقعه كسي كه بر گرفتي
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برخواندي
و رقص در گرفتي
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بردي
و بدان غريب دادي
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كز
وي سخن غريب زادي
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او
نيز بديهه اي روانه
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گفتي
به نشان آن نشانه
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زين
گونه ميان آن دو دلبند
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مي
رفت پيام گونه اي چند
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زآوازه
آن دو بلبل مست
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هر
بَلبَله اي كه بود بشكست
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بر
رود و رباب و ناله چنگ
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يك
رنگ نواي آن دو آهنگ
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زايشان
سخني به نكته راندن
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وز
چنگ زدن زناي خواندن
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از
نغمه آن دو هم ترانه
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مطرب
شده كودكان خانه
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خصمان،
دَر طعنه باز كردند
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در
هر دو زبان دراز كردند
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و
ايشان زبد گزاف گويان
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خود
را به سرشك ديده شويان
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بودند
بر اين طريق سالي
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قانع
به خيال و چون خيالي
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