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به
ياد بزرگان |
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دلا
تا بزرگي نياري به دست
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به
جاي بزرگان نشايد نشست
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بزرگيت
بايد در اين دسترس
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به
ياد بزرگان برآور نفس
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سخن
تا نپرسيد لب بسته دار
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گهر
نشكني تيشه آهسته دار
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نپرسيده
هر كو سخن ياد كرد
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همه
گفته خويش بر باد كرد
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به
بي ديده، نتوان نمودن چراغ
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كه
جز ديده را دل نخواهد به باغ
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سخن
گفتن آنگه بود سودمند
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كز
آن گفتن آوازه گردد بلند
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چو
در خورد گوينده نايد جواب
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سخن
ياوه كردن نباشد صواب
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دهن
را به مسمار بر دوختن
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به
از گفتن و گفته را سوختن
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چه
مي گويم اي نانيوشنده مرد
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ترا
گوش بر قصه خواب و خورد
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چه
داني كه من خود چه فن مي زنم
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دهل
بر دَرِ خويشتن مي زنم
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متاع
گرانمايه دارم بسي
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نيارم
برون تا نخواهد كسي
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مرا
با چنين گوهري ارجمند
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همي
حاجت آيد به گوهر پسند
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نيوشنده
اي خواهم از روزگار
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كه
گويم بدو راز آموزگار
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بكاوم
به الماس او كان خويش
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كنم
بسته درجان او جان خويش
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زمانه
چنين پيشه ها پُر دهد
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يكي
دُر ستاند يكي دُر دهد
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مگر
بار بر گنج از آن رو نشست
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كه
تا رايگان مهره نايد به دست
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اگر
نخل خرما نباشد بلند
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ز
تاراج هر طفل يابد گزند
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منم
سرو پيراي باغ سخن
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به
خدمت ميان بسته چون سرو بن
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فلك
وار دور از فسوس همه
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سرآمد
ولي پاي بوس همه
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نخندم
بر اندوه كس برق وار
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كه
از برق من در من افتد شرار
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به
هر خار چون گل صلايي زنم
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به
هر زخم چون ني نوايي زنم
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نمايم
جو و گندم آرم به جاي
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نه
چون جوفروشان گندم نماي
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كه
ديدست بر هيچ رنگين گلي
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زمن
عالي آوازتر بلبلي
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به
هر دانشي دفتر آراسته
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به
هر نكته اي خامه اي خواسته
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پذيرفته
از هر فني روشني
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جداگانه
در هر فني يك فني
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شكردانم
از هر لب انگيختن
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گلابي
زهر ديده اي ريختن
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كسي
را كه در گريه آرم چو آب
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بخندانمش
باز چون آفتاب
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گه
از هر سخن بر تراشم گلي
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بر
آن گل زنم ناله چون بلبلي
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اگر
بِهْ ز خودگلبني ديدمي
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گل
سرخ يا زرد ازو چيدمي
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نشينم
چو سيمرغ درگوشه اي
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دهم
گوش را از دهن توشه اي
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در
خانه را چون سپهر بلند
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زدم
بر جهان قفل و بر خلق، بند
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يكي
مرده شخصم به مردي روان
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نه
از كارواني و در كاروان
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به
صد رنج دل يك نفس مي زنم
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بدان
تا نخسبم جرس مي زنم
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ندانم
كسي كو به جان و به تن
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مرا
دوست تر دارد از خويشتن
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ز
مهر كسان روي بر تافتم
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كس
خويش هم خويش را يافتم
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گَرَم
نيست روزي ز مهر كسان
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درحاجت
از خلق بر بسته بِهْ
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ز
درباني آدمي رسته بِهْ
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مرا
كاشكي بودي آن دَسترس
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كه
نگذارمي حاجت كس به كس
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زميني
كه دارد بر و بوم سُست
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اساسي
برو بست نتوان درست
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به
رونق توانم من اين كار كرد
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به
بي رونقي كار نايد زمرد
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چو
دردانه باشد تمناي سود
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كديور
در آيد به كشت و درود
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غله
چون شود كاسد و كم بها
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كند
برزگر كار كردن رها
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ترنم
شناسان دستان نيوش
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ز
بانگ مغني گرفتند گوش
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ضرورت
شد اين شغل را ساختن
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چنين
نامه نغز پرداختن
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به
نقشي كه نزد كلان نيست خرد
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نمودم
بدين داستان دستبرد
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از
اين آشنا روي تر داستان
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خنيده
نيامد بر راستان
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دگر
نامه ها را كه جويي نَخُست
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به
جمهور ملت نباشد درست
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نباشد
چنين نامه تزوير خيز
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نبشته
به چندين قلمهاي تيز
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به
نيروي نوك چنين خامه ها
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شرف
دارد اين بر دگر نامه ها
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سخنگوي
پيشينه داناي طوس
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كه
اراست روي سخن چون عروس
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در
آن نامه كان گوهر سفته راند
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بسي
گفتنيها كه ناگفته ماند
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اگر
هر چه بشنيدي از باستان
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بگفتي
دراز آمدي داستان
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نگفت
آنچه رغبت پذيرش نبود
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همان
گفت كز وي گزيرش نبود
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نظامي
كه در رشته گوهر كشيد
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قلم
ديده ها را، قلم در كشيد
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به
ناسفته دري كه در گنج يافت
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ترازوي
خود را گهر سنج يافت
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شرفنامه
را فرخ آوازه كرد
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حديث
كهن را بدو تازه كرد
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