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پيرزن
و سلطان سنجر
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پيرزني
را ستمي درگرفت
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دست
زد و دامن سنجر گرفت
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كاي
ملك آزرم تو كم ديده ام
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وزتو
همه ساله ستم ديده ام
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شحنه
مست آمده در كوي من
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زد
لگدي چند فرا روي من
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بي
گنه از خانه برونم كشيد
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موي
كشان بر سر كويم كشيد
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در
ستم آباد زبانم نهاد
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مُهر
ستم بر در خانم نهاد
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گفت
فلان نيمشب اي گوژپشت
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بر
سر كوي تو فلان را كه كشت
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خانه
من جست كه خوني كجاست
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اي
شه ازين بيش زبوني كجاست
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شحنه
بود مست كه آن خون كند
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عربده
پيرزني چون كند
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كوفته
شد سينه مجروح من
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هيچ
نماند از من و از روح من
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گر
ندهي داد من اي شهريار
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باتو
رود روز شمار اين شمار
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داوري
و داد نمي بينمت
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وز
ستم آزاد نمي بينمت
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از
ملكان قوّت و ياري رسد
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از
تو به ما بين كه چه خواري رسد
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بنده
اي و دعوي شاهي كني
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شاه
نئي چونكه تباهي كني
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شاه
كه ترتيب ولايت كند
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حكم
رعيت به رعايت كند
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تا
همه سر بر خط فرمان نهند
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دوستيش
در دل و در جان نهند
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عالم
را زير و زبر كرده اي
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تا
تويي آخر چه هنر كرده اي
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مسكن
شهري ز تو ويرانه شد
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خرمن
دهقان ز تو بي دانه شد
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عدل
تو قنديل شب افروز توست
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مونس
فرداي تو امروز توست
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پيرزنان
را به سخن شاددار
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و
اين سخن از پيرزني ياد دار
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چند
زني تير به هر گوشه اي
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غافلي
از توشه بي توشه اي
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فتح
جهان را تو كليد آمدي
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نز
پي بيداد پديد آمدي
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رسم
ضعيفان به تو نازش بود
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رسم
تو بايد كه نوازش بود
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گوش
به دريوزه انفاسد دار
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گوشه
نشيني دو سه را پاس دار
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سنجر
كاقليم خراسان گرفت
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كرد
زيان كاين سخن آسان گرفت
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