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سليمان
و دهقان
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روزي
از آنجا كه فراغي رسيد
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باد
سليمان به چراغي رسيد
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مملكتش
رخت به صحرا نهاد
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تخت
بر اين تخته مينا نهاد
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ديد
به نوعي كه دلش پاره گشت
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برزگري
پير در آن ساده دشت
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خانه
ز مشتي غله پرداخته
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در
غله دان كرم انداخته
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دانه
فشان گشته به هر گوشه اي
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رُسته
ز هر دانه او خوشه اي
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پرده
آن دانه كه دهقان گشاد
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منطق
مرغان ز سليمان گشاد
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گفت
جوانمرد شو اي پيرمرد
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كاين
قدرت بود به بايست خورد
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دام
نئي، دانه فشاني مكن
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با
چو مني مرغ زباني مكن
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بيل
نداري گل صحرا مخار
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آب
نيابي جو دهقان مكار
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ما
كه به سيراب زمين كاشتيم
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زآنچه
بكشتيم چه برداشتيم؟
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تا
تو در اين مزرعه دانه سوز
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تشنه
و بي آب چه آري به روز
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پير
بدو گفت مرنج از جواب
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فارغم
از پرورش خاك و آب
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با
تر و با خشك مرا نيست كار
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دانه
زمن پرورش از كردگار
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آب
من اينك عرق پشت من
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بيل
من اينك سر انگشت من
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نيست
غم ملك و ولايت مرا
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تا
منم اين دانه كفايت مرا
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آنكه
بشارت به خودم مي دهد
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دانه
يكي هفتصدم مي دهد
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