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ختم
كتاب
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نظامي
هان و هان تا زنده باشي
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چنان
خواهم چنان كافكنده باشي
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نه
بيني دُر كه دريا پرور آمد
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از
افتاده چگونه بر سر آمد
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چو
دانه گر بيفتي بر سر آيي
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چو
خوشه سرمكش كز پا در آيي
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مدارا
كن كه خوي چرخ تند است
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به
همت رو كه پاي عمر كند است
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هوا
مسموم شد با گرد مي ساز
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دوا
معدوم شد با درد مي ساز
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برون
كش پاي ازين پاچيله چيله تنگ
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كه
كفش تنگ دارد پاي را لنگ
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قدم
درنه كه چون رفتي رسيدي
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همان
پندار كاين ده را نديدي
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اگر
عيشي است صد تيمار با اوست
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وگر
برگ گلي صد خار با اوست
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به
تلخي و به ترشي شد جواني
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به
صفرا و به سودا زندگاني
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به
وقت زندگي رنجور حاليم
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كه
با گرگان وحشي در جواليم
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به
وقت مرگ با صد داغ حرمان
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ز
گرگان رفت بايد سوي كرمان
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زگرگان
تا به كرمان راه كم نيست
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ز
ما تامرگ مويي نيز هم نيست
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سري
داريم و آن سر هم شكسته
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به
حسرت بر سر زانو نشسته
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چو
مويي برف ريزد پر بريزيم
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همه
در موي دام و دد گريزيم
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بدين
پا تا كجا شايد رسيدن
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بدين
پر تا كجا شايد پريدن
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ستمكاري
كنيم آنگه به هر كار
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زهي
مشتي ضعيفان ستمكار
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كسي
كو بر پر موري ستم كرد
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هم
از ماري قفاي آن ستم خورد
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به
چشم خويش ديدم درگذرگاه
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كه
زد بر جان موري مرغكي راه
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هنوز
از صيد منقارش نپرداخت
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كه
مرغي ديگر آمدكار او ساخت
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مگر
نشنيدي از فراش اين راه
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كه
هر كو چاه كند افتاد در چاه
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همان
بِهْ كاين نصيحت ياد گيريم
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كه
پيش از مرگ يك نوبت بميريم
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ز
محنت رست هر كو چشم در بست
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بدين
تدبير طوطي از قفس رست
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بدين
قاروره تا چند آب ريزي
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بدين
غربال تا كي خاك بيزي
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نخواهد
ماند آخر جاودانه
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در
اين نه مطبخ اين يك چارخانه
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چو
وقت آيد كه وقت آيد به آخر
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نهانيها
كنند از پرده ظاهر
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نبيني
گرد ازين دوران كه بيني
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جز
آن قالب كه در قلبش نشيني
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از
ين جا توشه بر كانجا علف نيست
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در
اينجا جو كه آنجا جز صدف نيست
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در
اين مشكين صدفهاي نهاني
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بسا
درها كه بيني از معاني
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نو
آيين پرده اي بيني دلاويز
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نواي
او نوازشهاي نوخيز
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كهن
كاران سخن پاكيزه گفتند
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سخن
بگذار، مرواريد سفتند
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سخنهاي
كهن زالي مطرّا ست
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وگر
زال زر است انگار عنقاست
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درنگ
روزگار و گونه گرد
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كند
رخسار مرواريد را زرد
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نگويم
زر پيشين نو نيرزد
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چو
دقيانوس گفتي جو نيرزد
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گذشت
از پانصد و هفتاد و شش سال
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نزد
بر خط خوبان كس چنين خال
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چو
دانستم كه دارد هر دياري
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زمهر
من عروسي در كناري
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طلسم
خويش را از هم گسستم
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به
هر بيتي نشاني باز بستم
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بدان
تا هر كه دارد ديدنم دوست
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ببيند
مغز جانم را در اين پوست
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اگر
من جان محجوبم تن اين است
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وگر
يوسف شدم پيراهن اين است
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عروسي
را كه فرش گل نپوشد
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اگر
پوشد ز چشم از دل نپوشد
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نظامي
نيز كاين منظومه خواني
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حضورش
در سخن يابي عياني
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نهان
كي باشد از تو جلوه سازي
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كه
در هر بيت گويد با تو رازي
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پس
از صد سال اگر گويي كجا او
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ز
هر بيتي ندا خيزد كه ها او
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چو
كرم قز شدم از كرده خويش
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بريشم
بخشم ار برگي كنم ريش
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حرامم
باد اگر آبي خورم خام
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حلالي
بر نيارم پخته را كام
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نخسبم
شب كه گنجي بر نسنجم
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دري
بي قفل دارد كان گنجم
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زمين
اصلي ام در بردَن رنج
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كه
از يك جو پديد آرم بسي گنج
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زدانه
گر خورم مشتي به آغاز
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دهم
وقت درودن خرمني باز
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بر
آن خاكي هزاران آفرين بيش
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كه
مشتي جو خورد گنجي كند پيش
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